संजय अमान

जीवन अक्सर ऐसे मोड़ लाता है जहाँ इंसान या तो टूट जाता है या फिर खुद को नया रूप देकर और मज़बूती से खड़ा हो जाता है। सुब्रह्मण्यम कृष्णस्वामी (सुब्बू) की कहानी इसी दुस्साहस और आत्मविश्वास की मिसाल है।   34 साल तक उन्होंने फार्मा और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में एक सम्मानित और स्थिर करियर बनाया। मेहनत, ईमानदारी और नेतृत्व—इन तीन स्तंभों पर उनकी पहचान कायम थी। लेकिन 2018 में किस्मत ने अचानक करवट ली। एक साजिश के तहत उन पर झूठे आरोप लगाए गए और उनकी नौकरी चली गई। सिर्फ नौकरी ही नहीं, प्रतिष्ठा और कई रिश्ते भी इस झटके से बिखरने लगे।
यह वह समय था जिसने सुब्बू को भीतर तक झकझोर दिया। लगभग 15 महीनों तक बेरोजगारी और अपमान की चोटें उन्हें सहनी पड़ीं। कोई भी कमज़ोर मन होता तो शायद टूट जाता, लेकिन सुब्बू ने इस अंधेरे दौर को आत्म-विकास का अवसर बना लिया।

उन्होंने अपने मन, शरीर और आत्मा को समझने की यात्रा शुरू की। ऑक्यूल्ट साइंस—ग्राफोलॉजी, रेकी, न्यूमेरोलॉजी, टैरो, ज्योतिष और वास्तु—इन सबमें उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। पहले उन्होंने इन विधाओं को खुद पर लागू किया, अपनी ऊर्जा को संतुलित किया, अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचाना और फिर खुद को धीरे-धीरे हील किया।

जब खुद की रोशनी जागी, तब उन्होंने दूसरों की जिंदगी में भी वही उजाला बाँटना शुरू किया। उनका दर्द उन्हें दूसरों की पीड़ा समझने में मदद करता गया। 2019 के अंत तक उनका जीवन फिर से सही दिशा पकड़ने लगा।

आज सुब्रह्मण्यम कृष्णस्वामी सिर्फ एक स्पिरिचुअल हीलर नहीं, बल्कि एक प्रेरक शक्ति बन चुके हैं। वे हजारों लोगों को जीवन में दिशा, उम्मीद और आत्मविश्वास देने का काम कर रहे हैं। उनका सफर हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी सबसे अंधेरा वक्त ही हमें अपनी असली रोशनी खोजने की राह दिखाता है।

सुब्बू की कहानी यह सिखाती है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, संकल्प और सकारात्मक दृष्टिकोण से उसे अवसर में बदला जा सकता है।

उनका संदेश बहुत साफ है: “जिंदगी चाहे जितना भी गिरा दे, अगर हिम्मत नहीं छोड़ी तो दोबारा उठना और चमकना तय है।”संकट से संकल्प तक का यह सफर हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो कभी हताश हो चुका हो।

सुब्रह्मण्यम कृष्णस्वामी (लोग प्यार से उन्हें “सुब्बू” कहते हैं) एक ऐसे इंसान हैं जिन्होंने जीवन के सबसे काले दौर में भी हार नहीं मानी। 34 साल तक फार्मास्यूटिकल्स और लॉजिस्टिक्स जैसे बड़े-बड़े क्षेत्रों में ऊँचे पदों पर काम करने के बाद अचानक सब कुछ छिन गया। नौकरी गई, सम्मान गया, रिश्ते टूटने की कगार पर पहुँच गए, और जो लोग कभी उनके मुरीद थे, वही पीठ पीछे बुराई करने लगे। लेकिन सुब्बू ने उस जहर को पीकर भी जिंदगी को नई दिशा दे दी। आज वे एक सफल ऑक्यूल्ट साइंस प्रैक्टिशनर, स्पिरिचुअल हीलर और हजारों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

ऊँचाई से गिरकर फिर उठना

जनवरी 2018 तक सब कुछ परफेक्ट था। भारत में 19 साल और विदेश में 14 साल का शानदार करियर। हाई-प्रोफाइल पोस्ट, अच्छी सैलरी, परिवार में सुख-शांति। लेकिन एक आंतरिक साजिश ने सब उजाड़ दिया। झूठे इल्ज़ाम लगे, अपमान हुआ, और मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद पूरा 15 महीने तक नौकरी नहीं मिली, चाहे कितनी भी कोशिश की। पैसों की तंगी, समाज का ताना, रिश्तों में खटास — सब कुछ एक साथ आ गया।उस दौर में सुब्बू ने एक बात गांठ बांध ली थी —  “एक चीज जिसे आप रिसाइकल नहीं कर सकते, वह है बर्बाद किया हुआ समय।”इसलिए उन्होंने रोना-धोना छोड़ दिया और खुद को व्यस्त रखने के लिए ऑक्यूल्ट साइंस की पढ़ाई शुरू कर दी। ग्राफोलॉजी, रेकी, न्यूमेरोलॉजी, फेस रीडिंग, टैरो, पामिस्ट्री, ज्योतिष, वास्तु, माइंडफुलनेस, पॉजिटिव थिंकिंग — एक के बाद एक विषय सीखते चले गए। पहले खुद पर प्रयोग किया, फिर दूसरों की मदद करने लगे।

नया जन्म

दिसंबर 2019 में जैसे चमत्कार हुआ। सही मेंटर मिले, सही लोग मिले, और जिंदगी ने फिर पलटी मारी — इस बार सही दिशा में। कॉर्पोरेट जीवन में जो कम्युनिकेशन स्किल्स, डिसीजन मेकिंग, ईमानदारी और प्रेजेंस ऑफ माइंड सीखा था, वही गुण अब लोगों को हील करने में काम आए। आज सुब्बू हजारों लोगों को स्पिरिचुअल हीलिंग के जरिए नई उम्मीद देते हैं। वे कहते हैं — “मैं उनका दर्द समझता हूँ, क्योंकि मैं वहाँ से गुजरा हूँ।”

आज का सुब्बूआज सुब्रह्मण्यम कृष्णस्वामी एक खुश, संतुष्ट और ऊर्जावान इंसान हैं। वे मानते हैं कि दुनिया दिमाग से बड़ी है और दिल एक गहरा रहस्य। वे उस परम शक्ति के सामने समर्पण करते हैं जो उनकी रक्षा करती है। उनकी कविता की आखिरी पंक्तियाँ उनकी जिंदगी का फलसफा हैं

:“मैं लड़खड़ा सकता हूँ, लेकिन पूरी ताकत से वापस लड़ूँगा

क्योंकि मैंने कभी हार नहीं मानी और कभी नहीं मानूँगा…”

सुब्बू की कहानी हमें सिखाती है कि जब जिंदगी आपको सबसे नीचे गिरा दे, तब भी अगर हिम्मत न छोड़ें तो नया सवेरा जरूर आता है। वे जीता-जागता सबूत हैं कि इंसान की असली ताकत उसकी हार नहीं, बल्कि दोबारा उठने की जिद में छुपी होती है।आप भी कभी टूटे हैं और फिर खड़े हुए हैं ? सुब्बू की यह यात्रा आपको भी प्रेरित करेगी।

” जय हो जीवन की ”

  • ( इस लेख के लेखक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार और गऊ भारत भारती समाचारपत्र के संपादक है  )

 

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