भारत में प्रतिवर्ष लगभग ५०० मिलियन टन गौ गोबर उत्पन्न होता है। इसे यदि कूड़ा मानकर फेंक दिया जाए तो यह मीथेन गैस छोड़कर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, लेकिन यदि इसका वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो यही गोबर भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है।१. बायोगैस (Bio-Gas) – घरेलू हरित ईंधन

  • एक औसत देसी गाय प्रतिदिन १०-१२ किलो गोबर देती है।
  • २ किलो गोबर + २ किलो पानी से बने घोल से एक १ घन मीटर बायोगैस प्लांट में १ घन मीटर बायोगैस बनती है।
  • १ घन मीटर बायोगैस = ०.४५-०.५ किलो LPG के बराबर।
  • एक ४ जनों का परिवार ४-५ गायों के गोबर से अपना पूरा रसोई गैस मुफ्त में चला सकता है।

आज देश में ५० लाख से अधिक परिवार स्तर के बायोगैस प्लांट चल रहे हैं। नए मॉडल (जैसे फ्लेक्सी बायोगैस, SINTEC, KVIC फ्लोटिंग ड्रम) इतने आसान हो गए हैं कि छत पर भी लगाए जा सकते हैं।२. CBG (Compressed Bio-Gas) – पेट्रोल-डीज़ल का देसी विकल्प

  • बायोगैस को शुद्ध करके ९५-९८% मीथेन बनाई जाती है, इसे CBG कहते हैं।
  • १ टन गोबर से लगभग ४०-५० किलो CBG बनती है।
  • १ किलो CBG = १.२५ लीटर पेट्रोल या १.४ लीटर डीज़ल के बराबर ऊर्जा देती है।

सरकार का SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना के अंतर्गत ५००० CBG प्लांट लगाने का लक्ष्य है।

  • एक ५ टन प्रतिदिन क्षमता वाला CBG प्लांट प्रतिदिन २ टन जैविक खाद भी देता है।
  • अभी तक १०० से अधिक CBG प्लांट चालू हो चुके हैं (Reliance, Indian Oil, Adani, HPCL आदि लगा रहे हैं)।
  • २०३० तक १५ मिलियन टन CBG उत्पादन का लक्ष्य = १५% प्राकृतिक गैस की जगह ले सकता है।

३. बिजली उत्पादन (Bio-CNG से Electricity)

  • १०००% गोबर से चलने वाले बायोगैस प्लांट से बिजली भी बनाई जा सकती है।
  • १ क्यूबिक मीटर बायोगैस से २-२.५ यूनिट बिजली बनती है।
  • महाराष्ट्र के बारामती में १० मेगावाट, राजस्थान में ५ मेगावाट क्षमता के गोबर आधारित पावर प्लांट सफलतापूर्वक चल रहे हैं।

४. जैविक खाद – बोनस लाभबायोगैस प्लांट का बचा हुआ स्लरी रासायनिक खाद से ३०-४०% अधिक उपज देने वाली बेहतरीन जैविक खाद होती है। इससे किसान की खाद का खर्चा भी बच जाता है।५. पर्यावरणीय लाभ

  • १ टन गोबर से बायोगैस बनने पर ३-४ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोकता है।
  • पराली जलाने की समस्या भी कम होती है क्योंकि किसान पराली की जगह गोबर बेचकर कमाई करते हैं।
  • मीथेन (जो CO₂ से २५ गुना अधिक ग्लोबल वार्मिंग करती है) को नियंत्रित किया जाता है।

प्रमुख सफल उदाहरण

  1. पुणे के उरुली कांचन में पंडित साठे जी का ३५ साल पुराना बायोगैस प्लांट आज भी चल रहा है।
  2. इंदौर नगर निगम रोज़ ५५० टन गोबर-कचरे से CBG बना रहा है और पूरे शहर की सफाई गाड़ियाँ CBG से चलती हैं।
  3. गुजरात का बनासकांठा डेयरी रोज़ ४० टन गोबर से CBG बना रही है।
  4. हरियाणा के करनाल में गौसंवर्धन केंद्र १०० टन गोबर रोज़ प्रोसेस करता है।

निष्कर्षगौ गोबर कोई अपशिष्ट नहीं, अपार ऊर्जा का खजाना है। यदि भारत अपने ३० करोड़ पशुओं के गोबर का केवल ५०% का भी उपयोग बायोगैस/CBG में कर ले तो:

  • ५० मिलियन टन जैविक खाद
  • २० मिलियन टन CBG (लगभग २५ अरब लीटर पेट्रोल के बराबर)
    -डाइज़ल)
  • १० करोड़ परिवारों को मुफ्त रसोई गैस
  • १०० गीगावाट बिजली क्षमता

यह केवल ऊर्जा क्रांति नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वच्छ भारत और जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का त्रिवेणी संगम है।
गौ गोबर सचमुच भारत का “ग्रीन गोल्ड” है।
ॐ गौमातरूपेण संरक्षितं विश्वम्।
जय गौमाता! जय हरित ऊर्जा!

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